ऐक और . . .
ऐक और अभिव्यक्ति। मुबारक हो शैल , हिन्दी चट्ठे कि दुनीया में आपका स्वागत है।
नई शक्ति, नई चमकार के साथ पद्मजा का चिठ्ठा अब हिन्दी में।
कड़ाके की ठंड थी , पर हम ६.४५ पे निकल ही पड़े। बेटमा मे एक जगह अलाव जलते देखा तो रुक कर हाथ ताप लिये, साथ में चाय की तलब बिना बोले लग ही जाती है। धार में थोड़ा काम निपटा कर चाय पोहे खा कर आगे बढ़े, १ घंटे मे मांडव। बीच में कुछ ४ की.मी. का रास्ता काफी खराब था। रानी रुपमती महल, बाज बहादुर महल, चंपा बावड़ी, जामी मस्जिद, जहाज महल, हिंडोला महल के अवशेष आज भी पुराने वैभव की दास्तान सुनाते हैं। जहाज महल मुझे सबसे ज्यादा पसंद आया। घूमते घूमते २ बज गये, लौटते हुऐ गॉर्ज व्यू पे करीब आधा घंटा बैठे बड़ा ही सुकून भरा पॉईंट है ये। ३ बजे वापस आने को चले, रास्ते में धार मे खाना खाया, ५ बजे वापस अपने घर।
कल तो सब अच्छा लग रहा था पर आज हड्डीयां बोल रही हैं।
अगर ट्रिगर में कोई मुसीबत आ जाये तो सिर्फ रेज़ शब्द लिख कर उसको आगे चलता कर सकते है , बिना आडे हाथों लिये।
ये आज की सीख है ।
हे भगवान ! ये डाँक्युमेन्टेशन कितना बोर करता है । दो प्रोजेक्ट के बीच के समय को बरबाद करता है | कही अनकही सारी डीटेल्स लीखवा लेता है ।
बस अब बहुत हो चुका । अब कुछ काम की बात लिखी जाये । पर क्या लिखा जाय , कुछ अलग और कुछ और की चाह पता नहि कहा ले जायेगी । अब चिट्ठे को तो इंग्लिश से हिन्दी मे ले हि आये है, बाकी रही बात लिखने की तो वो भी आ ही जायेगा । हा, देवाशीष की मदद से और आलोक के चिट्ठे से प्रेरीत हो कर आज ऐक रुका हुआ काम आगे तो बढ़ा ।